अब संतुष्टि नहीं, सुकून चाहिए
बचपन की सोच में
एक आशा हुआ करती थी,
आगे बढ़ने की चाहत,
कुछ अच्छा कर गुज़रने की
एक आग हुआ करती थी।
उसी आग को सीने में लेकर,
एक उम्र गुज़ार दी
आगे निकलने की आपाधापी में,
हर दिन ख़ुद को झोंक दिया
कुछ बनने की तैयारी में।
पर इतनी दूर आकर भी,
जब संतुष्टि नहीं मिली,
तो अब ख़ुद से कहती हूँ—
नहीं मिली, तो भाड़ में जाए!
बिल्कुल भाड़ में जाए!
जो मिला, उसका शुक्रिया,
जो नहीं मिला, उसे जाने दो,
जो बीत गया, उसे बीतने दो,
अब ख़ुद को भी थोड़ा जी लेने दो।
ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा
दूसरों और ख़्वाबों के नाम कर दिया,
अब जो थोड़ी-सी उम्र बची है,
उसे अपने नाम कर लेने दो।
अब न किसी से आगे निकलना है,
न किसी को कुछ साबित करना है,
न हर ख़ुशी के पीछे भागना है,
न हर कमी का हिसाब करना है।
बहुत दौड़ ली ज़िंदगी की दौड़,
अब थोड़ा ठहरना है,
बहुत जी लिया सबके लिए,
अब ख़ुद के लिए जीना है।
क्योंकि आख़िर में
सफलता की सूची नहीं,
मन का सुकून मायने रखेगा,
और जो इंसान सारी उम्र
ख़ुद को ही भूलकर जीता रहा,
वो अब ख़ुद को याद रखेगा।
अब बस,
बहुत हुआ हिसाब-किताब,
बहुत हुआ ख़ुद से सवाल।
जो हासिल किया, वो कम नहीं,
जो नहीं मिला, उसका मलाल नहीं।
अब बाक़ी ज़िंदगी पर
किसी उम्मीद का बोझ नहीं—
अब मुझे कुछ बनना नहीं,
बस अपने लिए जीना है।
— रजनी