लड़ाई अब शायद तुम्हारी मेरी है ही नहीं
निकल चुकी है बात तुमसे मुझसे आगे
और हम लाख चाहे भी तो नामुमकिन है
कि हो जाए हम दोनों के बीच कोई सुलह
ऐसा नहीं कि मुझे ये सब अच्छा लगता है
मैं अपनी हार मे तुम्हारी जीत नहीं देख रहा
ना ही मेरी कोई ज़िद ही है तुमसे जुड़ी मुझमें
पर तुम्हारा हाथ छोड़ना, नहीं हो सकता
तुम्हारे उसूल मेरे प्यार से बड़े नहीं हो सकते
वो उसूल जिसकी ऊँची दीवार की हर ईंट
पे लग चुकी है उस दुनिया की ओछी फफूंद
जो ना तुझे पसंद है ना ही मुझे रास है
जल्दी किसे है इसे तोड़ने या फादने की
चोट करूँगा इसपे धीरे धीरे रोज़ चुपचाप मैं
मुझे पता है क़ैद किसी को नहीं भाती है
और अगर मैं ये दीवार ना भी गिरा पाया
तो पता है एक दिन इस दीवार के उस पार से
तुम खुद चली आओगी इस पार मेरे लिये
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