आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मेरे लिए

                
                                                         
                            लड़ाई अब शायद तुम्हारी मेरी है ही नहीं
                                                                 
                            
निकल चुकी है बात तुमसे मुझसे आगे
और हम लाख चाहे भी तो नामुमकिन है
कि हो जाए हम दोनों के बीच कोई सुलह
ऐसा नहीं कि मुझे ये सब अच्छा लगता है
मैं अपनी हार मे तुम्हारी जीत नहीं देख रहा
ना ही मेरी कोई ज़िद ही है तुमसे जुड़ी मुझमें
पर तुम्हारा हाथ छोड़ना, नहीं हो सकता
तुम्हारे उसूल मेरे प्यार से बड़े नहीं हो सकते
वो उसूल जिसकी ऊँची दीवार की हर ईंट
पे लग चुकी है उस दुनिया की ओछी फफूंद
जो ना तुझे पसंद है ना ही मुझे रास है
जल्दी किसे है इसे तोड़ने या फादने की
चोट करूँगा इसपे धीरे धीरे रोज़ चुपचाप मैं
मुझे पता है क़ैद किसी को नहीं भाती है
और अगर मैं ये दीवार ना भी गिरा पाया
तो पता है एक दिन इस दीवार के उस पार से
तुम खुद चली आओगी इस पार मेरे लिये

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
।
5 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर