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का बा

raj rashmi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            का बा का बा रटते-रटते चढ़ गयी चने की झाड़ पर,
        
                                                    
                            
टोंटी वाले कब लाओगे भव्यमहल के दुअरिया।

बेदर्दी खुजली ने मोहे फांसा भ्रम की जाल में
दौलत की चिंगारी भर दी छोटे से दिमाग़ में।

कुद पड़ी मैं रण में लेकर सपने बंगला कार के
डूब रही हूँ आँसू लेकर उम्मीदें सब हार के।

अब पछताऊँ रोऊँ छलके नैयनो की गगरिया
भरी सभा में खुल गई मेरी मंशा की गठरिया।

का बा का बा रटते-रटते चढ़ गयी चने की झाड़ पर

- *मुक्ता रश्मि* मुजफ्फरपूर (बिहार)
3 वर्ष पहले
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