चलिए रामकाज करते हैं…
स्मार्ट शहर की दुर्दशा पर
किसी ने सुध तक ली नहीं,
ओपन जिम के प्रोजेक्ट चल पड़े,
पर मशीनें एक दिन भी सही चली नहीं।
करोड़ों का बजट फाइलों में घुसा,
कागज़ों पर बहुत कुछ हुआ,
पर ज़मीनी हकीकत
कुछ और ही कहानी कहने लगी।
खराब पड़ी मशीनों की सुध
किसी को लेने की फुर्सत नहीं,
मेयर साहब—उपमेयर साहब की
अब तक नींद जागी नहीं।
कैसे बनेगा अजमेर स्मार्ट सिटी—
इस पर आज तक बात हुई नहीं।
फाइलों में करोड़ों की राशि बहती रही,
पर उस पर कोई चर्चा नहीं,
मशीनें लगने के बाद
मेंटेनेंस चाहती हैं—
पर उस दिशा में किसी की नज़र गई नहीं।
बगीचे बच्चे खिलाते हैं,
मन को भी हरियाली देते हैं,
RSS की शाखा भी यहीं लगती है,
पर संघ के सदस्यों का ध्यान
इस ओर जाता नहीं।
कागज़ों में कार्रवाई करने से
शहर नहीं बनते,
विकास के लिए कार्यकर्ताओं की
सच्ची लगन चाहिए—
स्पष्टवादिता की पहल
किसी ने करी नहीं।
कैसे बनेगा अजमेर स्मार्ट सिटी—
जब उस पर चर्चा ही नहीं?
रामकाज करने को आतुर
कोई तैयार नहीं,
क्या पद पर रहते हुए
ईमानदारी से काम करना
रामकाज नहीं?
एक वार्ड का पार्षद भी
रामकाज कर सकता है—
पर क्या ये सवाल
किसी के मन में आता नहीं?
शायद वो भी अभी भूल गए…
चलिए…
उन्हें एक बार फिर याद दिलाते हैं,
ये आवाज़ उन तक पहुंचाते हैं।
मंदिर जाना, आरती करना,
सत्संग सुनना, सुंदरकांड करना—
सब भक्ति के मार्ग हैं,
पर कर्मों में बेईमानी बरतना
कहाँ तक सही है?
आम जनता की उम्मीद
आपसे जुड़ी है,
इसलिए अपनी शक्ति पहचानें—
काम पर लगें,
और रामकाज में हाथ मिलाएँ।