कितना
बदला हूं?
सुधार... या, बिगाड़...
क्या समझूं?
कोशिश
चल रही होती है...
कश्मकश
थमती है, फिर उठती है
तन्हाई का
नाम बदला
हर एक क्षण
मोती, नगीना
मेरी ज़िद
ख़ुद में सुधार लाने की!
मेरी ज़िद
आख़िर तक हार ना मानने की!
कहीं ना...
नज़र ले जाने की...
सिर्फ़ एक ओर... चलते जाने की... !
रोग ही नहीं
दवाई का क्या करूं?
मैं, बदलते मौसम...
के संग ढल जाऊं
-राहुल