फ़ज़ीहत करवा ली...
कैसा लगा राहुल?
अब बांध के रखना
अपने दिमाग के पाँव!
तन्हाई,
बुरी चीज़ तो नहीं?
सदा आई
इतने दूर... कौनसी?
लड़े ही नहीं
तो क्या मतलब
फिर हार मिली... ?
पर, तू तो होगा मजबूत!
(कुछ कारणों के लिए ही... तेरे सिले चोट...)
बाहों में समेट के
सारी हसी पी जाएगें आपकी!
ऐसा,
कहती है तिश्नगी...
जाने, दो यार...
कई हारें हैं संभालनी
.