सप्तम शक्ति: माँ कालरात्रि
घोर निशा सम रूप विकट धरि, प्रलय घटा घन छा जाती।
दुष्ट-दलन हित खड्ग उठा कर, कालरात्रि माँ आ जाती॥
भाल अनल महुँ धधक रहा है,
मुंड-माल उर राज रही।
गर्दभ-वाहन गर्जन तीखा,
रण-भेरी विकराल रही।
भय-हारी जग-तारक बन के, तिमिर-विनाशन पा जाती॥
दुष्ट-दलन हित खड्ग उठा कर, कालरात्रि माँ आ जाती॥
पाप-पंक सब भस्म करन को,
ज्वाला-मुख से फूट पड़े।
दुष्ट-दानवी सेना कंपित,
दर्प-दंभ सब टूट पड़े।
मुक्त करे सब संकट-बंधन, शरण पड़े रस ला जाती॥
दुष्ट-दलन हित खड्ग उठा कर, कालरात्रि माँ आ जाती॥
ज्ञान-ज्योति का दीप जला कर,
मोह-जाल सब काट रहीं।
सप्तम रूप भवानी का धर,
अमृत-ममता बाँट रहीं।
सिद्ध-योगिनी भक्त-सुखद माँ, मन-मंदिर सरसा जाती॥
दुष्ट-दलन हित खड्ग उठा कर, कालरात्रि माँ आ जाती॥
-आचार्य प्रताप