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केरल के द्वार....

Rahul Chaudhary

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक प्रहर यूं झर झर,
        
                                                    
                            
बादल पिघला हर हर,
जल कोष बिछाया घर घर,
उथल पुथल जीवन मर मर ।

हरियाली छिप गई जल बीच अधर,
खेत निपट गए होकर जर्जर,
घरौंदे बुने थे वर्षों तिनकों पर ,
बूंदों की सेना ले गई दूर डगर ।

मुस्कुराहटें ले बह गई जलधार ,
दाने दाने पर कर गई विष का प्रहार,
गालियां खोकर डूबी इस मझधार,
जनजीवन त्रस्त हो के भटक रही संसार ।

मानवता का वजूद का आधार ,
मानव राहत बन उमड़े द्वार द्वार,
थोड़ी खुशियां थोड़ी उपकार,
पहुंचे लेके हिम्मत बढ़ाने केरल इस बार ।

परमात्मा से बंदगी यू हाथ जोड़कर ,
क्षमा याचना किसी भूल या कसर,
वन्दे है तेरे ,बच्चे हैं हृदय में तेरा दरबार,
रहमत कर,कृपा की ए प्रभु तेरी दरकार ।

- राहुल चौधरी

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले
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