विज्ञापन

एक सुबह...

ragini sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            रात के गहरे स्याह परदे को
        
                                                    
                            
चुपचाप हटाती
एक किरण आती है
धीरे-धीरे, जैसे
कोई प्रार्थना उतरती हो।

ओस की हथेली पर
टिकी हुई नींद
अचानक मुस्काती है,
और पत्तों की पाँखों पर
लिख जाता है नया उजास।

हवा के कंधे पर
फूलों की गंध रखी है,
जो गाँव की गलियों में
बचपन-सी दौड़ती फिरती है।

लाल नहीं केवल सूरज
आज कुछ और भी है
भीतर की आग में
जलता हुआ धैर्य
और प्रतीक्षा का सोना।

हरे खेतों में
उम्मीदें झुककर
धरती को प्रणाम करती हैं,
और किसान के हाथों में
भविष्य उगता है धीरे-धीरे।

नीले आकाश में
पंछियों की पंक्ति
किसी अधूरी कविता-सी
पूरा होना चाहती है।

और मैं
अपने ही भीतर
उगती हुई एक सुबह को
शब्दों में उतारती हूँ
चुपचाप… धीरे-धीरे…

कि शायद
इसी को कहते हैं जीवन
रंगों का लौटना
और मौन का
प्रकाश बन जाना।
- रागिनी स्वर्णकार
3 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Manju Sharma

3561 कविताएं

View Profile