रात के गहरे स्याह परदे को
चुपचाप हटाती
एक किरण आती है
धीरे-धीरे, जैसे
कोई प्रार्थना उतरती हो।
ओस की हथेली पर
टिकी हुई नींद
अचानक मुस्काती है,
और पत्तों की पाँखों पर
लिख जाता है नया उजास।
हवा के कंधे पर
फूलों की गंध रखी है,
जो गाँव की गलियों में
बचपन-सी दौड़ती फिरती है।
लाल नहीं केवल सूरज
आज कुछ और भी है
भीतर की आग में
जलता हुआ धैर्य
और प्रतीक्षा का सोना।
हरे खेतों में
उम्मीदें झुककर
धरती को प्रणाम करती हैं,
और किसान के हाथों में
भविष्य उगता है धीरे-धीरे।
नीले आकाश में
पंछियों की पंक्ति
किसी अधूरी कविता-सी
पूरा होना चाहती है।
और मैं
अपने ही भीतर
उगती हुई एक सुबह को
शब्दों में उतारती हूँ
चुपचाप… धीरे-धीरे…
कि शायद
इसी को कहते हैं जीवन
रंगों का लौटना
और मौन का
प्रकाश बन जाना।
- रागिनी स्वर्णकार
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