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युवा जागृति एवं आत्मनिर्भर कृषि

Radheshyam Khatik

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बनाकर बहाना बेकारी का,
        
                                                    
                            
कब तक यूँ घूमते रहोगे?
पंगु बनकर बेबसी का
दोष औरों को देते रहोगे।

गुज़र गईं कई सदियाँ,
गुलामी की जंजीरों में।
बनकर हम कठपुतलियाँ,
नाचे अमीरों की चौखट पे।

भीड़ का हिस्सा बनकर,
क्यों आस लगाए औरों की?
सामर्थ्य को पहचानकर,
सुध लो खेत-खलिहानों की।

चीर के सीना धरती का,
सींचो पसीना आँचल में।
ओढ़ चोला हरियाली का,
बहार लाएगी जीवन में!

- राधेश्याम खटीक
 
3 घंटे पहले
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