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अच्छे दिन कब आएंगे

radhe singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            वक़्त बीतता गया और बीतता गया
        
                                                    
                            
ये दिल अब तो मान ले
अच्छे दिन अब नहीं आएंगे
यही सच है जान ले

माना तू फिर लुट गया है
संतोष कर ले|
पिछले 70 सालों से
यूँ ही तुझे लूटा गया है|

पता नहीं सरकार किन
आकरों में उलझ गयी
कुछ रियासतों में सियासत की
और मान लिया हर उलझने सुलझ गयी

सफाई अभियान दो
डब्बों के हरे नीले रंग हो गये
और हम इतना खूल के बोलें
की हमारे आपस के रिस्ते तंग हो गये

शौचालय हर घर में हो
सोच अच्छी थी
पर ये ना देखा की उस घर में
ना रोटी थी ना कर्छी थी

लाल किले से कहानी
हमें समझ में नहीं आती है
अच्छे दिन हम मान लेते
अगर किसी किशान की जान फिर नहीं जाती
बुंदेलखंड की कोई मा घांस की रोटी नहीं बनती
कोख से बचाई बेटियां फिर समाचार नहीं बनती
कुछ तो ऐसा संबाद होता जो दिल से दिल को जोड़ती

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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8 वर्ष पहले
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