वक़्त बीतता गया और बीतता गया
ये दिल अब तो मान ले
अच्छे दिन अब नहीं आएंगे
यही सच है जान ले
माना तू फिर लुट गया है
संतोष कर ले|
पिछले 70 सालों से
यूँ ही तुझे लूटा गया है|
पता नहीं सरकार किन
आकरों में उलझ गयी
कुछ रियासतों में सियासत की
और मान लिया हर उलझने सुलझ गयी
सफाई अभियान दो
डब्बों के हरे नीले रंग हो गये
और हम इतना खूल के बोलें
की हमारे आपस के रिस्ते तंग हो गये
शौचालय हर घर में हो
सोच अच्छी थी
पर ये ना देखा की उस घर में
ना रोटी थी ना कर्छी थी
लाल किले से कहानी
हमें समझ में नहीं आती है
अच्छे दिन हम मान लेते
अगर किसी किशान की जान फिर नहीं जाती
बुंदेलखंड की कोई मा घांस की रोटी नहीं बनती
कोख से बचाई बेटियां फिर समाचार नहीं बनती
कुछ तो ऐसा संबाद होता जो दिल से दिल को जोड़ती
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