वीर भोग्या वसुंधरा की पंक्ति करो चरितार्थ ।
कार्य सिद्ध होने के खातिर पूर्ण करो तुम स्वार्थ ।।
हार कर गर बैठ जाओगे सुनो मेरे धनुर्धर ।
आयु में फिर बहुत सी आएगी बाधाएं दुर्धर।।
कब तलक बाधाओं से बचते हुए तुम जाओगे ।
यो हमेशा शीश को अपने झुकाते जाओगे।।
यदि विकल होते सभी हैं क्या विकल कल भी न होंगे ।
हर समय क्या बैठ कर खुद नेत्र में आशू भरोगे ।।
सत्य है यदि तुम स्वयं को कष्ट देना चाहते हो ।
भाग्य के यदि हाथों में यूं लुप्त होना चाहते हो।।
आत्म ग्लानि की अगर अग्नि कभी प्रज्वलित होगी ।
क्या समय जाने के कारण ताप हृदि को न लगेगी।।