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मै लिखता हूं कविता

Rabindra Aman

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            खुद को मार कर हमने कुछ हारा कुछ जीत
        
                                                    
                            
हां में कवि हूं, मै लिखता हूं कविता

कभी किसी की खुशी लिखूं, कभी लिखूं किसी का गम
औरों का दुख दर्द लिखकर , खुद का दर्द हो जाता है कम

कोई पल गंवाए ना , कोई सदियाँ करे बर्बाद
लगाकर आग अपनी दुनिया में, यहां वहां करते हैं फरियाद

हमने देखा है यहां लोगों के कितने रंग
किसी की चाहत दो वक्त की रोटी,
कोई खेलना चाहे चांद तारों के संग

चलकर अपनी राह, देकर अपने उसूलों का वास्ता
ढूंढने वाले ढूंढ लेते हैं, हर मुश्किल में अपना रास्ता

आगे बढ़ने वाले नित कहानी नई बनाते हैं
बुजदिल, लाचार, गंवार टूटकर बिखर जाते हैं

हमने सोच लिया है, हमको अगर है जीना
नहीं रुकेंगे, नहीं झुकेंगे
अगर हमको पड़े जहर पीना
-रविन्द्र अमन 
एक घंटा पहले
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