विज्ञापन

अभी किराए के मकान, एक छोटा सा घर में हूं

Rabindra Aman

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मैं गुमनाम हूं, मेरा कोई नही है मुकाम
        
                                                    
                            
हमको जाना है बहुत दूर, मै अभी सफ़र में हूं

कितना खरा उतरूंगा मै अपने इरादों पर
इसी जद्दोजहद में हूं, खुद की ही नजर में हूं

कुछ पाने की धुन मुझपर संवार है
मुझको होश नहीं मै कहां हूं,
अभी किस शहर में हूं

एक ना एक दिन मुझको साहिल से है टकराना
जब मुझमे है रवानी, चाहे लाख भंवर में हूं

कोई मेरा अपना रास्ता देखता है
मैं किसी के इंतजार में हूं,
किसी के दुवा असर में हूं

महंगी पड़ेगी मुझसे मेरे दुश्मन तेरी दुश्मनी
नहीं रहेगा तेरा रुतबा, मै तेरे जहर में हूं

इस दुनिया को बनाना है अपना ठिकाना
अभी किराए के मकान, एक छोटा सा घर में हूं

निकल जाना है तोड़कर इस दुनिया की हर दीवार को
अब वक्त आ गया है, कुछ पल के लिए ही रहगुजर में हूं

मुझको मेरी बुलंदी हँस कर बुला रही है
मुझसे कह रही है "अमन" मै तेरे दिल जिगर में हूं
-रविन्द्र अमन
2 सप्ताह पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Manju Sharma

3561 कविताएं

View Profile