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अभी किराए के मकान, एक छोटा सा घर में हूं

                
                                                         
                            मैं गुमनाम हूं, मेरा कोई नही है मुकाम
                                                                 
                            
हमको जाना है बहुत दूर, मै अभी सफ़र में हूं

कितना खरा उतरूंगा मै अपने इरादों पर
इसी जद्दोजहद में हूं, खुद की ही नजर में हूं

कुछ पाने की धुन मुझपर संवार है
मुझको होश नहीं मै कहां हूं,
अभी किस शहर में हूं

एक ना एक दिन मुझको साहिल से है टकराना
जब मुझमे है रवानी, चाहे लाख भंवर में हूं

कोई मेरा अपना रास्ता देखता है
मैं किसी के इंतजार में हूं,
किसी के दुवा असर में हूं

महंगी पड़ेगी मुझसे मेरे दुश्मन तेरी दुश्मनी
नहीं रहेगा तेरा रुतबा, मै तेरे जहर में हूं

इस दुनिया को बनाना है अपना ठिकाना
अभी किराए के मकान, एक छोटा सा घर में हूं

निकल जाना है तोड़कर इस दुनिया की हर दीवार को
अब वक्त आ गया है, कुछ पल के लिए ही रहगुजर में हूं

मुझको मेरी बुलंदी हँस कर बुला रही है
मुझसे कह रही है "अमन" मै तेरे दिल जिगर में हूं
-रविन्द्र अमन
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 सप्ताह पहले

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