विज्ञापन

जिंदगी कड़वा जाम है

Rabindra Aman

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अंदर चाहे जैसा हो, बाहर रखते हैं सजाकर
        
                                                    
                            
हम कुछ बोले तो बदनाम हुए हम शायर

आग लगेगी तो धुआँ उठेगा
कैसे रखोगे धुएँ को समझाकर

लोग लगाते हैं एक दूसरे को चुना
खुद दिल के काले हो जाते हैं
औरों को टोपी पहनाकर

जो हकीकत है उसको आने दो सामने
क्यों खुद को छुपाते हो, लजा कर ,शर्माकर

जिंदगी कड़वा जाम है,इसे गले से उतार लो
शर्त है रोकर नही, जरा सा मुस्कुराकर

- रविन्द्र अमन - कोलकाता
2 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Manju Sharma

3561 कविताएं

View Profile