अंदर चाहे जैसा हो, बाहर रखते हैं सजाकर
हम कुछ बोले तो बदनाम हुए हम शायर
आग लगेगी तो धुआँ उठेगा
कैसे रखोगे धुएँ को समझाकर
लोग लगाते हैं एक दूसरे को चुना
खुद दिल के काले हो जाते हैं
औरों को टोपी पहनाकर
जो हकीकत है उसको आने दो सामने
क्यों खुद को छुपाते हो, लजा कर ,शर्माकर
जिंदगी कड़वा जाम है,इसे गले से उतार लो
शर्त है रोकर नही, जरा सा मुस्कुराकर
- रविन्द्र अमन - कोलकाता
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