बहुत दूर है ठिकाना ...
दूर कहीं रोशनी में
कोई डुबकी लगा गया
झिलमिलाते जुगनू की तरह
ऐसा रोशनदान ने कहा
राह तकते रहे घड़ी की तरह
वो जलजला सा आया गया
पर्वतमाला की चोटियों पर
एक उम्मीद का दिया जला गया
ऐसा ढलती हुयी सांझ ने कहा
राह तकते रहे चातक की तरह
बूंद- बूंद नीर झर- झर बह गया
भीगे वन ,फूल ,पात, खर- पतवार
ऐसा पीहू - पीहू पपीहे ने कहा
राह तकते रहे बूंदों की लड़ियों की तरह
बहुत दूर है ठिकाना ऐसा मेघ ने कहा
पहुंच भी गये तो एक दिन
बरस जाएंगे बरसात बन सावन की तरह
या बरस जाएंगे पूस में शबनम की तरह
Pushpa Pandey
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।