तुमसे दूर
ऐसा भी क्या
कुछ कहा ना सुनो
ना नजरें ही मिलाईं
बस मुँह फेरा
और चल दिए?
रोक पाना कहां किसी से बस होता है
जाना ही था तो चले जाते
पर कह तो जाते
और कुछ नहीं तो कम से कम
तुम्हें जी भर कर देख ही लेते
पर नहीं ऐसा कुछ नहीं किया तुमने
आखिर क्यों
सब कुछ अनायास, अकस्मात,
अचानक और असमय किया
ऐसा भी क्या था
शायद ऐसा ही तुमने सोच रखा था
तभी तो, तभी तो, कभी-कभी
खुशी के मौके पर भी
तुम्हारी हंसी के पीछे
मैंने देखी थी
एक अनकही उलझन
मैंनें तुम्हारे सभी संकेत
महज मजाक में उड़ा दिए
तुम्हारे सारे दुखः
अपने सुखों में भुला दिए
हाँ जानबूझ पर नहीं
शायद यह सब अनजाने में हुआ
मेरे अनजाने में
पर तुम, तुम्हे तो सब पता था
मेरे मन से थे
सब कुछ जानकार भी अनजान बने थे
तभी तो शायद तुमने
कटु से कटु बात कह दी और नहीं भी
सब की सबसे होले से, हंसते-हंसते से
शायद इसलिए किया कि
यह जहर सिर्फ तुम पी सको
सिर्फ अकेले तुम
यह खुद्दारी ही सही, आदर्श ही सही
पर इसे मैं अपनत्व पर प्रहार ही समझाऊंगा
तुम्हारे बहुत निकट होकर भी
अपने को
तुमसे दूर ही समझूंगा।
- पुरुषोत्तम श्रीवास्तव 'पुरु'