वो सलाईयों की खट-खट, वो ऊन का गोला, माँ ने बड़े जतन से, यादों को है तोला।
एक फंदा प्यार का, एक दुआ की गाँठ, धूप में बैठकर बुनी, ममता की वो शाख।
न नाप लिया शरीर का, न कोई पैमाना था, उनके पास तो बस, स्नेह का खजाना था।
तिरछी बुनाई में छिपे, संघर्षों के निशान, हर धागे में पिरोई, अपनी पूरी जान।
बाज़ार की ऊन में, वो बात कहाँ आएगी, जो माँ के हाथों की छुअन, दिल तक पहुँचाएगी।
वो स्वेटर नहीं था, एक मखमली एहसास था, कड़कड़ाती ठंड में, वो सबसे पास था।
वक्त के साथ भले ही, रंग थोड़ा फीका हुआ, पर माँ का वो हुनर, कभी न फीका हुआ।
उधड़ते धागों में भी, एक अलग ही आस है, क्योंकि उसमें आज भी, माँ की खुशबू पास है।
जब भी पहनती हूँ उसे, लगता है माँ साथ है, मेरे सिर पर टिका, उनका वही आशीष भरा हाथ है।
दुनिया की हर ठंड से, वो मुझे बचा लेता है, माँ का बुना स्वेटर, एहसास प्यार का दिलाता है।
-पूर्णिमा सुमन