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कोरोना और ज़िन्दगी

Puneet Shrivastav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            चल रही थी ज़िन्दगी अपनी गति से रात दिन,
        
                                                    
                            
कि अचानक एक शय ने जग को कर डाला उच्छिन।

ना वो शय दिखता किसी को ना सुनाई ही दिया,
आके उसने जान जहान पे गुप्त प्रहार है किया।

क्या अमीरी क्या गरीबी सब है दरवाज़ो में बंद,
फर्क इतना है, गरीबी लड़ रही है खुद से जंग।

लोग खुश हैं कुछ, तो कुछ हैरान हैं घर में बैठ कर,
सुधरे ना हालात तो, कैसे कटेगा ये सफ़र।

है कहीं कोहराम, तो संतोष मन में है कहीं
कुछ की हैं नींदे उड़ी, कोई शांत सोया है कहीं।

भूख से बेहाल हैं कुछ, कुछ के सिर ना छाँव है
चल पड़े अपने घरों को वो तो नंगे पाँव है।

सूनी गलियाँ, सूनी बस्ती और शहर के रास्ते
सब घरों में हैं रुके एक दूसरे के वास्ते।

जो जहाँ, ठेहरो वहीँ पे, सख़्त ये आदेश है
धन से पहले जान बचाना, बस यही उद्देश्य है।

नष्ट कर देंगे, हरा देंगे, ये निश्चय मन में है
एक होकर थामें अपने पाँव हमने घर में है।

एक आशा है दिलों में, कि वो दिन फिर आएंगे,
साथ बैठेंगे सभी के, यारों से मिल पाएंगे।

तुम सदा ही धैर्य रखना, कर्म करना प्यार से
जो थमी है फिर चलेगी, ज़िन्दगी रफ्तार से।


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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