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वो कुछ तो नदी पार की बातें  हैं मुकद्दम

Professor Ravindra Pratap Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            वो कुछ तो नदी पार की बातें  हैं मुकद्दम
        
                                                    
                            
हमको है कहां फ़ुर्सत हम इधर ही रहते हैं।

वैसे पैग़ाम कई आए कई बार को झोंके भी
लेकिन थी कहां फ़ुर्सत घर बार  से अपने ।

हम भी अगर जाते किसी रोज़ फिर उधर
बेचें अगर होते ज़मीर ओ खुद नज़र ।

कुछ और हाल होता ,दिखता कुछ अलग
हमको थी कहां फ़ुर्सत ,हम इधर ही अच्छे थे ।
2 महीने पहले
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