वो कुछ तो नदी पार की बातें हैं मुकद्दम
हमको है कहां फ़ुर्सत हम इधर ही रहते हैं।
वैसे पैग़ाम कई आए कई बार को झोंके भी
लेकिन थी कहां फ़ुर्सत घर बार से अपने ।
हम भी अगर जाते किसी रोज़ फिर उधर
बेचें अगर होते ज़मीर ओ खुद नज़र ।
कुछ और हाल होता ,दिखता कुछ अलग
हमको थी कहां फ़ुर्सत ,हम इधर ही अच्छे थे ।
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