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अलविदा

Professor Ravindra Pratap Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अलविदा
        
                                                    
                            
(अज़ाम अबीदोव की कविता
मूल कवि : अज़ाम अबीदोव
काव्यानुवादक : प्रो रवीन्द्र प्रताप सिंह)


जाने भी दो , खींच लो अपने हाथ ,मेरे दिल से
आज़ाद करो मेरी रूह , जो रुख किये है तुम्हारी ओर ,
मेरे ख़्वाब- अलविदा , जिसने मुझे खुद की पहचान दी !
अलविदा ये जगह , ग़म भरी -ग़म भरी !
जाने भी दो , हर ख़ुशी को हटाना है मुझे
वैसे भी अलग होने हैं , रास्ते तुम्हारे हमारे !
मालूम है मुझे , तुम रहोगी बाक़रा,
पाक़, बिलकुल पाक़ , जैसे हो तुम !
मुझे जाने दो , खुदा से कहूंगा , तुम्हे बख्शे बड़ी उमर!
जाने दो मुझे , छोड़ना है मुझे हरेक चीज़
लड़खड़ाता रहा मेरा दिल , तुम्हारी नज़रे इनायत के लिये
मर भी जाऊँ तो क्या ,
मेरी शफ़्फ़ाक़ मुहब्बत के साथ
जाने दो।


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले
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