भूलने बैठा हूं जिसे, याद फिर आ ही गई
रात की तन्हाइयों में, बात फिर आ ही गई
कल डायरी से जो निकली, एक पुरानी-सी चिट्ठी
उसमें तेरी मुस्कुराती, झलक फिर आ ही गई
पिछले बरस बुलाया था तुमने मुझे मिलने को
उस पुराने इंतज़ार की, सौगात फिर आ ही गई
उस छोटी-सी मुलाक़ात ने बदल दिया आलम सभी
आज फिर दिल में वही, बरसात फिर आ ही गई
मैं जिसे दफ़्न कर आया था ख़्वाब की गहराई में
उसकी खुशबू से मेरी, औक़ात मुझ पर आ ही गई
तेरे जाने से जो टूटे थे कई सपने मेरे
उन अधूरे ख़्वाबों की, शुरुआत फिर आ ही गई
हर सड़क पे सुनता हूं अब भी तेरी आहट कहीं
जैसे चुपके से कोई, बरसात फिर आ ही गई