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तुम्हें मेरी फ़िक्र तो है

Prince Avinash

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ‎‎तुमने कहा—“फिर कभी, कि तुम परेशान होगे,”
        
                                                    
                            
‎हम मुस्कुरा दिए कि तुम्हें मेरी फ़िक्र तो है।

‎मुलाक़ात टल गई, इसका हमें रंज भी क्या,
‎तुम्हारी बात में छुपी कोई ज़िक्र तो है।

‎तुम्हें पसंद नहीं मेरा यूँ बार-बार मिलना,
‎मगर मेरी ख़ैर पूछना ये भी तो फ़िक्र तो है।

‎हमने तुम्हारी “ना” को भी दिल से मान लिया,
‎इंकार में भी तुम्हारी कोई नज़र तो है।

‎न तुमसे कोई शिकायत, न मिलने की ज़िद है,
‎तुम्हारी ख़ुशी ही हमारे लिए सब्र तो है।

‎तुम्हें लगा कि मैं शायद उदास हो जाऊँगा,
‎तुम्हें ये सोचने की आख़िर कोई फ़िक्र तो है।

‎मैंने चाहा था तुम्हें—बस तुम्हारी रज़ा तक,
‎तुम्हारी रज़ा से आगे न मेरा सफ़र तो है।

‎कभी जो वक़्त मिले और तुम ख़ुद आना चाहो,
‎हमारे दिल में अभी भी वही शहर तो है।

‎तुम्हें ख़बर हो न हो, बात इतनी-सी है मगर,
‎तुम्हारा नाम मेरे दिल में बेख़बर तो है।

‎तुम्हें पाना मेरी चाहत सही, मगर ऐ जान,
‎तुम्हें खोने का कोई मुझे डर तो है।

‎तुम्हारे साथ न हो पाई आज एक शाम अगर,
‎तुम्हारी याद के नाम पूरी सहर तो है।

‎और आख़िर में बस इतना ही कहना है तुमसे—
‎तुम्हें मेरी नहीं शायद, मुझे तुम्हारी क़दर तो है।

एक दिन पहले
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