तुमने कहा—“फिर कभी, कि तुम परेशान होगे,”
हम मुस्कुरा दिए कि तुम्हें मेरी फ़िक्र तो है।
मुलाक़ात टल गई, इसका हमें रंज भी क्या,
तुम्हारी बात में छुपी कोई ज़िक्र तो है।
तुम्हें पसंद नहीं मेरा यूँ बार-बार मिलना,
मगर मेरी ख़ैर पूछना ये भी तो फ़िक्र तो है।
हमने तुम्हारी “ना” को भी दिल से मान लिया,
इंकार में भी तुम्हारी कोई नज़र तो है।
न तुमसे कोई शिकायत, न मिलने की ज़िद है,
तुम्हारी ख़ुशी ही हमारे लिए सब्र तो है।
तुम्हें लगा कि मैं शायद उदास हो जाऊँगा,
तुम्हें ये सोचने की आख़िर कोई फ़िक्र तो है।
मैंने चाहा था तुम्हें—बस तुम्हारी रज़ा तक,
तुम्हारी रज़ा से आगे न मेरा सफ़र तो है।
कभी जो वक़्त मिले और तुम ख़ुद आना चाहो,
हमारे दिल में अभी भी वही शहर तो है।
तुम्हें ख़बर हो न हो, बात इतनी-सी है मगर,
तुम्हारा नाम मेरे दिल में बेख़बर तो है।
तुम्हें पाना मेरी चाहत सही, मगर ऐ जान,
तुम्हें खोने का कोई मुझे डर तो है।
तुम्हारे साथ न हो पाई आज एक शाम अगर,
तुम्हारी याद के नाम पूरी सहर तो है।
और आख़िर में बस इतना ही कहना है तुमसे—
तुम्हें मेरी नहीं शायद, मुझे तुम्हारी क़दर तो है।
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