बरसती है जेठ की धूप से भी फुहारें,
जब तुम काली साड़ी पहन कर आती हो।
हज़ारों तो देख कर ही जान गंवाते हैं,
जब तुम जुल्फ़ें संभाल कर शर्माती हो।
हम तो इश्क़ की राह में गिरने संभलने आए हैं,
तुम इन राहों पर क्यों नहीं चल पाती हो।
मोम है दिल तुम्हारा, इससे कभी नहीं खेलेगा "प्रिंस"
तुम मेरा सुकून हो ये बात कैसे नहीं समझ पाती हो