जिक्र अपनी वफाओं का करूं कैसे सच तो ये किया है महसूस मैने बदनसीबी से बढ़ कर कोई सज़ा नहीं
किया गलत क्या मैने जो मिजाज़ बदल गया निभाया रस्म ए वफा मैने शिद्दत से शक की कोई दवा नहीं
सुना कर तुम्हें फलसफा जिंदगी का जिंदगी का घबराए हैं हम बहुत सच ये तर्क ए गम की कोई दवा नहीं
सच ये है बदनसीबी से बढ़ कर कोई सज़ा नहीं आप जानते हैं और राह ए वफा शक की कोई दवा नहीं
चलो इसी बहाने हिसाब बर्बादियों का से दे ना पाऊंगा आपको कभी ये सोच कर दर्द की कोई दवा नहीं