विज्ञापन

सिलसिला ए नाकाम जिंदगी

Prem Narayan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            थक चुका मैं जिंदगी से कितने आंसू मैं और बहाऊंगा सुनसान राहों में लगा कर किसको जगाऊंगा
        
                                                    
                            
ऐ जिंदगी किताब के पन्ने जब पलटता हूं होता दर्द बहुत होकर दूर तुमसे किसको आवाज लगाऊंगा
बैठ कर अंधेरे घर में तन्हा हो जाऊंगा मगर याद रखना मैं भुला कर तुम्हें जिंदा ना कभी रह पाऊंगा
हूं जिंदा तेरे बदौलत करोगे जब तू याद करीब आ जाऊंगा और अपनी आवाज में दर्द सुना जाऊंगा
जुर्म ए खामोशी ना करके इल्तिज़ा मैं करूंगा जब तू देगा दवा दर्द बढ़ाने की तो बेशक मैं पी जाऊंगा
एक घंटा पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all