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फसाना ए रस्म ए उल्फत

Prem Narayan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तुम ही तो जान के अजनबी राह की दीवार हमें समझने लगे हो सोच कर महरूमी मेरी फासला अब बढ़ाने लगे हो
        
                                                    
                            
हम क्या सोच कर खुदा तुम्हें ही समझ बैठे हैं बदल कर फैसला अपना अब तो दर्द मेरा बेशुमार आप बढ़ाने लगे हो
मिजाज़ नसीब का जाना कहां किसी ने किया कोशिश संभलने की मगर आप बदल कर अंदाज़ दर्द बढ़ाने लगे हो
करूं मैं क्या बड़े सलीके से ऐतबार आप पर करना है मिल कर बिछड़ना तो इक हादसा था ये सच समझाने लगे हो
देकर जख्म हज़ार मत छेड़ो तुम तराना ए उल्फत हर किसी से मुझको ठुकराने वाले ऐ दोस्त मुझको सताने लगे हो
एक महीने पहले
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