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फसाना ए रस्म ए उल्फत

                
                                                         
                            तुम ही तो जान के अजनबी राह की दीवार हमें समझने लगे हो सोच कर महरूमी मेरी फासला अब बढ़ाने लगे हो
                                                                 
                            
हम क्या सोच कर खुदा तुम्हें ही समझ बैठे हैं बदल कर फैसला अपना अब तो दर्द मेरा बेशुमार आप बढ़ाने लगे हो
मिजाज़ नसीब का जाना कहां किसी ने किया कोशिश संभलने की मगर आप बदल कर अंदाज़ दर्द बढ़ाने लगे हो
करूं मैं क्या बड़े सलीके से ऐतबार आप पर करना है मिल कर बिछड़ना तो इक हादसा था ये सच समझाने लगे हो
देकर जख्म हज़ार मत छेड़ो तुम तराना ए उल्फत हर किसी से मुझको ठुकराने वाले ऐ दोस्त मुझको सताने लगे हो
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एक घंटा पहले

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