ना कर सका मैं करार किसी से समझ कर मजबूरी अपनी ही दिल अच्छा है या बुरा कहूं कैसे मजबूरी अपनी
फसाना ए जिंदगी अपनी समझ ना पाए हम जान के नादानी कह ना पाए कभी किसी से हम मजबूरी अपनी
या खुदा जानता हूं देख के मायूसी हुआ दर्द तुमको नहीं रख कर पत्थर दिल पे छुपाना पड़ा मजबूरी अपनी
गुज़ारा महरूमों का हुआ आसान कब हुए जब सामने मेरे तो कह ना पाया तुमसे ही बता के मजबूरी अपनी
हम इतने खुशनसीब कहां जो समझ पाओ मिला दर्द कितना जान कर बदनसीबी सोचना पड़ा गरीबी अपनी