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फसाना ए महरूम जिंदगी

Prem Narayan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            करके मुझसे तू इक बहाना फासला अब बढ़ाने लगे और करके सामना अपनी मुफलिसी का दर्द हम और बढ़ाने लगे
        
                                                    
                            
रहा मैं जिंदा कब अपनी मर्जी के मुताबिक लिपट कर अहसास ए तमन्नाओं से ही अब बेचैन दिल को हम सताने लगे
खातिर या लिहाज़ से अपना हमें तुमने भी जाना कहां मिटा कर अरमां सारे बेचैन दिल को हम अब याद दिलाने लगे
जाओ चिराग़ करो मत फैसला खिलाफ तू लगा के अब हिसाब नफा नुकसान का मुश्किलें अपनी कुछ बढ़ाने लगे
सिखा दिया है बर्बादियों ने ही घुट घुट जीना हमें करके कोशिश बार बार मासूम दिल को ही अब हम समझाने लगे

 
एक महीने पहले
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