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फसाना ए महरूम जिंदगी

                
                                                         
                            करके मुझसे तू इक बहाना फासला अब बढ़ाने लगे और करके सामना अपनी मुफलिसी का दर्द हम और बढ़ाने लगे
                                                                 
                            
रहा मैं जिंदा कब अपनी मर्जी के मुताबिक लिपट कर अहसास ए तमन्नाओं से ही अब बेचैन दिल को हम सताने लगे
खातिर या लिहाज़ से अपना हमें तुमने भी जाना कहां मिटा कर अरमां सारे बेचैन दिल को हम अब याद दिलाने लगे
जाओ चिराग़ करो मत फैसला खिलाफ तू लगा के अब हिसाब नफा नुकसान का मुश्किलें अपनी कुछ बढ़ाने लगे
सिखा दिया है बर्बादियों ने ही घुट घुट जीना हमें करके कोशिश बार बार मासूम दिल को ही अब हम समझाने लगे

 
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एक महीने पहले

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