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फसाना ए महरूम जिंदगी

Prem Narayan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जश्न ए बर्बाद मना रहा हूं देखा मैने जब अचानक सामने तुम्हें तो होकर खामोश नवा कर सर अब फासला बढ़ा रहा हूं
        
                                                    
                            
ना रही जिंदगी मेरी अब किसी काम की रहा रहा मैं जिंदा कब अपनी मर्जी के मुताबिक देख के सामने सच बता रहा हूं
सच तो ये है किया नाकामियों ने भी बदनाम हमें बार बार सुन कर वादे हजार सोच के अंजाम हुआ जो दर्द बता रहा हूं
रहा है गुमां आपको भी खुद की अदाओं पर हमसे होगा ना सब्र अब और समझा कर बेचैन दिल को दर्द और बढ़ा रहा हूं
बिछड़ के तुमसे होकर दर ब दर यादों के कारवां में भटकना भी पड़ा हमें करके गुजारिश तुमसे ही दिल को बहला रहा हूं
18 घंटे पहले
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