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दिया साथ कब किसी ने मुसीबत में जान

Prem Narayan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कर के गुज़ारा किसी तरह चैन ओ सकूं खो बैठे है और मिले ना तुम राह ए तलब तो हम सदमेें हजार बढ़ाने लगे
        
                                                    
                            
बढ़ा कर दर्द ओ तमन्ना अरमां सीने में सजाया नहीं करते होकर मायूस अपनी वफाओं से दर्द दिल का बढ़ाने लगे
निभाना रस्म ए वफा शिद्दत से आसान इतना नहीं है और देकर दिल हर किसी को चिराग़ दिल में हम जलाने लगे
अब तुम तो राज़ की बात को राज़ रहने दो समझ कर खुद को ही महरूम चिराग़ ए दिल अपना हम बुझाने लगे
दिया साथ कब किसी ने मुसीबत में जान के सच रहा मैं अंजान क्यूं मिटा के अरमां सारे दिल को हम सताने लगे

 
5 घंटे पहले
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