सच ये खेल किस्मत का कभी किसी ने जाना कहां और लड़ के अपनी किस्मत से अंदाज़ तेरा मैने कभी जाना नहीं
सजा के अरमां दिल में आंसू बहा रहे हैं गुजार दी है जो जिंदगी हुआ मजबूर मैं कितना सच तुमने कभी जाना नहीं
करके तू मनमानियां बुनियाद रिश्तों की कमजोर करने लगे दर्द सिर्फ ये सच क्या झूठ क्या तुमने भी जाना नहीं
बदल कर फैसला अपना किया तुमने अच्छा कब सितम ये बढ़ा के फासला फिर भी तुने कभी हमें पहचाना नहीं
निभाया हमने बार बार रस्म ए वफा शिद्दत से मगर बढ़ा के दर्द ओ तमन्ना बेशुमार तुमने हमें अपना जाना नहीं