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फसाना ए दर्द ए तमन्ना

Prem Narayan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मना कर जश्न ए बर्बादी अपनी ही हुनर जीने का सीख ना पाए देखा है मैने कितनी बार अंदाज़ तेरा बदलते हुए
        
                                                    
                            
सितम ये हुआ वक्त बर्बाद मेरा खुशामद तेरा करते करते मिला अचानक आज़ हमें तू रुख अपना ही बदलते हुए
जान कर खुश तुम्हें खुल कर दर्द अब मैं कह सकता नहीं गिला तुमसे ही कैसे कर पाऊं राह ए तलब भटकते हुए
फासला मुझसे बढ़ाने वाले दर्द मेरा तुने भी जाना कहां खातिर या लिहाज़ से दर्द कहना पड़ा है दिल समेटते हुए
ना दो अब हमें तुम दर्द गम ए जुदाई का समझ के मिजाज़ तेरा चिराग़ ए दिल जलाया अपना तुम्हें समझते हुए
एक महीने पहले
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