दिया तसल्ली हमें हर इक ने फिर भी आराम दिल को कहां हम सुनते रहे फिर भी लब पे तेरा नाम ना आया
ये ना पूछो दिल की राहों में किया जो सफर अच्छा रहा कब हूं खुशनसीब इतना मुझ पर इल्जाम ना आया
लगता है दिल ए बेताब तुझे मेरी कोई जरूरत नहीं भटक गए हम ही इधर उधर मगर वो मुकाम ना आया
सफर दिन का बीता कैसे ये मत पूछो मुझसे किया कोशिश भी लाख हमने मगर मुंतजिर ए शाम ना आया
ये बेचैनियाँ तो रहेंगी दिल में हमेशा दर्द तो सिर्फ इस बात का है तेरे लब पे भी कभी मेरा नाम तक ना आया