सोनपापड़ी का अजब फ़साना है, जो आज हमें आप सबको सुनाना है,
हुआ कुछ यूं इत्तेफाक, हमारे मायके से दिवाली का सामान भेजा गया,
जिसमें भाभी ने अपनी मनपसंद मिठाई सोनपापड़ी का भी डिब्बा रख दिया।
हमने जाकर वो जेठानी जी को दिवाली गिफ्ट पकड़ा दिया,
उन्होंने अपनी सहेली को दिवाली की मिठाई में भेंट किया,
उनकी सहेली हमारी देवरानी की मोहल्ले में रहती थी,
देवरानी हमारी से उसकी अच्छी खासी दोस्ती थी,
उसने वो सोनपापड़ी हमारी देवरानी को भेंट किया,
देवरानी जी ने हमारे बच्चों के लिए दिवाली की मिठाई कह कर हमें भेज दिया,
घूम-फिर कर हमारी सोनपापड़ी बेचारी हमारे पास आई,
जिसे फिर से हाथों में लेकर छूट गई हमारी रूलाई,
जिस सोनपापड़ी से पीछा छुड़ाने चले थे,
वही सोनपापड़ी देखा हमारे सिरहाने पड़े थे,
सोचो उस वक्त हमारा चेहरा कैसा लग रहा होगा,
जब उस सोनपापड़ी को हाथ में लिया जिससे पीछा छुड़ाने को हमने इतना जतन किया होगा,
अब तो बाई को देने के सिवा न कोई चारा रहा,
बीबी जी सोनपापड़ी छोड़कर कुछ और मिठाई देनी है तो दो वरना रहने दो,
कैसा लगा हमें जब उसने सोनपापड़ी को देख ये कहा।
-प्रेम बजाज