लेकर आगोश में
लेकर के आगोश में जब तुम प्यार से थपथपाते हो, ईश्वर का रूप नज़र आते हो,
कभी जब रख कर शाने पे मेरे, मूंद कर आंखें अपने दिल का हाल सुनाते हो, एक मासूम से बच्चे बन जाते हो।
कभी जब थाम कर आंचल मेरा उसकी छांव में अपने-आप को महफूज बताते हो,
तब कितना प्यारा सा मासुमियत भरा एहसास जगाते हो,
जब कभी मेरे भाल का लेकर चुम्बन मुझे अपना बताते हो, उस पल मेरे शहंशाह बन जाते हो।
कभी जब सीने पर अपने मेरा सर रखकर मेरे बालों
को सहलाते हो, उस पल प्यार का एहसास दिलाते हो,
कभी जब मेरे नाज़ुक लबों से अपने खुर्द लब टकराते हो,
पीकर मय लबों से मेरे मदहोश हो जाते हो, क्या कहूं
किस कदर मेरे तन-मन में इश्क की ज्वाला भड़काते हो।
छूकर लबों से अपने, मेरी कस्तूरी पर नाम अपना लिख जाते हो,
कैसे कहूं उस पल जो उठती है तलब मोहब्बत की, तुम समझ ना पाते हो।
कभी जब दुआ के लिए उठाया हाथ मैंने तो दुआ में तुम्हारी खुशियां ही मांगी है,
नहीं चाहा कभी अपने लिए कुछ, सदा सलामती तेरी मांगी है,
मगर जब बेवजह करते हो आहत, तब अपने नहीं पराए नज़र आते हो।