नज़र लड़ गई है जब से तुमसे हमारी सनम,
ना जीते हैं ना मरते हैं कसम तुम्हारी सनम।
ना दिन में चैन, ना करार रात में पड़ता है,
तड़प कर रह जाते हैं जब विरह का नाग डसता है।
कसम तेरे उन मद भरे नैनों की, बांध पिए ही हम झूमा करते हैं,
शराबी हो गया है तु, मुझे ये ज़माने वाले सब कहते हैं।
तुम शमां बन ग़ैर के घर की रौशन उसे काया करती हो,
हम बिन जलाए जलते हैं, हमें किस गुनाह की सज़ा दिया करती हो।
या खुदा क्या के दीदार-ए-यार दे दो थोड़ा सुकून मुझे भी,
ग़ैर के दामन में फूल, मेरे दामन कांटे, एक फूल बक्श दो मुझे भी।
गुनाह किया नज़र ने जिसने तुम्हारी नज़र से इश्क किया,
दिल को क्यों दी सज़ा, दिल ने कहां कोई कसूर किया।
प्रेम बजाज
जगाधरी ( यमुनानगर)
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