विज्ञापन

कितना बदल गया इंसान

prem bajaj

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            चलो फिर एक बार जीने की कोशिश करते हैं,
        
                                                    
                            
नफ़रत भरी इस दुनियां में कुछ प्यार के रंग भरते हैं।
था एक वक्त जब इन्सान दूसरों के लिए जिया करता था,
लेकर ग़म औरों के अपनी खुशियां दिया करता
था,आज देकर ग़म खुशियां छीना करता है, कितना
बदल गया इंसान, बन कर लालची औरों के हक छीना करता है।

ज़िंदगी के धूंधले बड़े कैनवस से ज़रा धूल को हटा कर तो देखो,
आओ ज़रा इसे अपनेपन के इत्र से महका कर तो देखो,
जब जाना ही है खाली हाथ इस जहां, से तो क्यों हृरस है हमें,
आओ ज़रा मेरा-तेरा का ये भेदभाव मिटा कर तो देखो।

आओ छोड़ दें भेदभाव हिन्दू- मुस्लिम का, इन्सान को इन्सान की पहचान करा दें,
खाएं कसम ना दिल दुखाएं किसी का, प्रेम का पाठ सबको पढ़ना सिखा दें,
बात नहीं केवल चार कन्धों की काम ऐसा कर जाए, कि हज़ारों लोग हमें अपना कंधा दे,
करें कर्म कुछ ऐसा हम जब गूंजे राम-नाम का उच्चारण आत्मा तक वो हमारी भी सुनाई दे।

प्रेम बजाज 
जगाधरी (यमुनानगर)

- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Rajiv Tyagi

423 कविताएं

View Profile

Anil Kumar

4215 कविताएं

View Profile

Sanjay Nirala

42 कविताएं

View Profile