ख़्वाब में ही सही
शब-ए-हिज्रा में याद जो तेरी आई, अंग-अंग मेरा झुलसा गई,
वो तेरा मेरे लबों को छूना, तेरे खुरदरे चेहरे का मेरे नरम रूखसारों से टकराना,
सीने पर रख कर हाथ अपना जो महसूस किया तुझे, वो हरारत मुझे तड़पा गई,
बीती रात का भीगा तकिया भी मुझे देता है ताने, वो बिन सिलवटों की चादर मुझे चिढ़ाती है,
वो मेरी कस्तूरी पर तेरा लबों से प्यार लिखना, उस की कसक आग लगाती है,
रह-रह कर मेरे उर-आंगन में तेरी यादें जाग जाती है,
तकिए को लेकर आगोश में ठंडी आहें हम भरने लगे,
तुम क्या जानो कि हम खुद से ज्यादा प्यार तुमसे करने लगे,
तुम सजाओ ख़्वाबगाह रकीबों की, हम शब-ए-हिज्रा में सिसकने लगे,
मेरी कस्तूरी पर तेरी उंगलियों के निशान अब भी मौजूद है,
तुम बसे हो ग़ैरों के दिल में, मगर मेरी धड़कन में बस एक तेरा ही तो वजूद है,
तेरी नशीली सांसों की महक से अभी भी मेरी सांसें बेसूद है,
उफ्फ वो मेरे नाज़ुक लबों से तेरे खुरदरे लबों का टकराना,
तेरा प्यार से मेरा अंग-अंग सहलाना, हाए क्या कयामत ढाता था तेरा मेरे करीब आना,
ख़्वाब में ही सही मगर एक बार तो आकर गले लगाना,
चंद सांसें मुझे और दे जाएगा तेरा मुझे ख़्वाब में भी छू जाना।
प्रेम बजाज ©®
जगाधरी ( यमुनानगर)