विज्ञापन

कहीं किसी रोज़

prem bajaj

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हमें वो लबों से गुनगुनाएंगे कहीं किसी रोज़,
        
                                                    
                            
हमारे प्यार को मान जाएंगे कहीं किसी रोज़।

इक रोज़ मेरे प्यार को जो ठुकरा कर चले गए,
प्यार की अर्जी लेकर आएंगे कहीं किसी रोज़।

नहीं आज परवाह उन्हें रिश्तों की बेशक,
रिश्ते शिद्दत से वो निभाएंगे कहीं किसी रोज़।

है मशरूफ वो आज रकीबों की महफ़िल में,
वही हमदम मेरे कहलाएंगे कहीं किसी रोज़।

किया है सनम ने वादा खाकर कसम हमारी,
फिर ना वो हमें सताएंगे कहीं किसी रोज़।

मोहब्बत हमारी ना कबूल की अभी तक उन्होंने,
राज़-ए-मोहब्बत खुद बताएंगे कहीं किसी रोज़।

जिस तरह तड़पाया है उन्होंने *प्रेम* को इश्क में,
हम भी उसी तरह उन्हें तड़पाएंगे कहीं किसी रोज़।

प्रेम बजाज ©®
जगाधरी ( यमुनानगर)

हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Rajiv Tyagi

423 कविताएं

View Profile

Anil Kumar

4215 कविताएं

View Profile

Sanjay Nirala

42 कविताएं

View Profile