सबके सपने कहा पूरे होते हैं, सिर्फ इंसान सपने पर सपने देखा करता है,
टूटता है जब सपना एक कोई तो सपना एक और नया हर इंसान बुनता है।
हो सपना पूरा या रहे अधूरा मगर कोशिश तो हर इन्सान किया करता है,
मैं तो इंसान हूं सपनों की आदी हूं, मगर सपनों से ना कभी हारी हूं,
हो पूरा ख्वाब या रहे अधूरा मन पर बोझ ना कोई रखती हूं।
हां मगर खुद को खुद में तलाशा करती हूं कोशिश करती हूं,
अपनी अस्मिता के पहचान ढूंढने की खुद पर किसी को ना हावी होने देती हूं,
हिम्मत से हर मुश्किल का मुकाबला करती हूं,
नहीं सताता मुझे भी कोई डर, डर को मुट्ठी में रखती हूं,
होकर मुखर या कलम से अपनी हर बात कहने का दम रखती हूं,
हां मैं कोई बोझ नहीं रखती मन पर,हर जंग जीता करती हूं।
प्रेम बजाज ©®
जगाधरी ( यमुनानगर)
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