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दर्द कहां से पाया

Prem Bajaj

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            उसने कहा इतना दर्द कहां से पाया, मैंने कहा तड़पाती है याद तुम्हारी,
        
                                                    
                            
उसने क आ भला की खुबसूरत है तुम्हारी, मैंने कहा नज़र है तुमहारी।
उसने कहा मोम सी पिघलती क्यूं हो, मैंने कहा आगोश की तपिश है तुम्हारी,
उसने कहा होंठ सुर्ख क्यों है, मैंने कहा छुअन है लबों की तुम्हारी।
उसने कहा मचलती क्यों हो, मैंने कहा चाहत की तड़प है तुम्हारी,
उसने कहा अंग-अंग महकता क्यों है, मैंने कहा खुशबू है तन की तुम्हारी।
उसने कहा लड़खड़ाती क्यों हो, मैंने कहा पी है मदिरा नैनों की तुम्हारी,
उसने कहा ढुंढती है किसको निगाहें, मैंने कहा रहती हर पल तलाश तुम्हारी।
उसने कहा पतंग सी लहराती क्यों हो, मैंने कहा डोर है मेरी हाथ में तुम्हारी,
उसने कहा साथ निभाएंगी कब तक,
उसने कहा हो ना सकेगा मिलन हमारा,मैंने कहा मर्ग तक रहेगी आरज़ू तुम्हारी।
2 वर्ष पहले
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